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मतदान का महत्व

मतदान निर्णय लेने या अपना विचार प्रकट करने की एक विधि है जिसके द्वारा कोई समूह विचार-विनिमय तथा बहस के बाद कोई निर्णय ले पाते हैं। मतदान की व्यवस्था के द्वारा किसी वर्ग या समाज का सदस्य राज्य की संसद या विधानसभा में अपना प्रतिनिधि चुनने या किसी अधिकारी के निर्वाचन में अपनी इच्छा या किसी प्रस्ताव पर अपना निर्णय प्रकट करता है। इस दृष्टि से यह व्यवस्था सभी चुनावों तथा सभी संसदीय या प्रत्यक्ष विधिनिर्माण में प्रयुक्त होती है।

राज्य के नागरिकों को देश के संविधान द्वारा प्रदत्त सरकार चलाने के हेतु, अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने के अधिकार को मताधिकार कहते हैं। जनतांत्रिक प्रणाली में इसका बहुत महत्व होता है। जनतंत्र की नीवं मताधिकार पर ही रखी जाती है। इस प्रणाली पर आधारित समाज शासन की स्थापना के लिये आवश्यक है कि प्रत्येक व्ययस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार प्रदान किया जाय।

जिस देश में जितने ही अधिक नागरिकों को मताधिकार प्राप्त रहता है उस देश को उतना ही अधिक जनतांत्रिक समझा जाता है। इस प्रकार हमारा देश संसार के जनतांत्रिक देशों में सबसे बड़ा है क्योंकि हमारे यहाँ मताधिकारप्राप्त नागरिकों की संख्या विश्व में सबसे बड़ी है। 

जनतंत्रात्मक सरकार में ही मतदान को प्रमुख क्षेत्र तथा महत्व प्राप्त होता है।

आपके एक अमूल्य मत से देश राज्य के भविष्य का निर्माण होता है इसलिये बेहतर भविष्य के लिए प्रत्येक नागरिक को मतदान का महत्व जानना आवश्यक है। लोकतंत्र की मजबूती एवं देश के समग्र विकास के लिये अधिक से अधिक मतदान जरूरी है। मतदाता अपने मत के माध्यम से अपनी ताकत दिखा सकता है और अपने मत के माध्यम से देश एवं प्रदेश के लिए एक अच्छी सरकार बनाने में सहयोग कर सकता है। मतदाता यदि अपने मत का बगैर सोच विचार या प्रलोभन और दबाव में आकर अयोग्य प्रत्याशी का चुनाव करता है या मतदान नही करता तो गलत नीतियों के विरूद्ध आलोचना करने का अधिकार भी नही रखता। देश के सवा सौ करोड़ लोगों की आवाज कुछ गिने-चुने लोग उठायें इससे बेहतर है कि शतप्रतिशत मतदान कर योग्य व्यक्ति को चुना जाये जो सब के हित की बात उठाये।

हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र प्रणाली में मतदान इसलिए अनिवार्य है कि जैसे धार्मिक दृष्टि से दान का महत्व है ठीक उसी प्रकार मतों का दान का महत्व है ताकि जनता निडर,ईमानदार कार्यकर्ता देशभक्ति से ओतप्रोत, लग्नशील कर्तव्यनिष्ठ प्रत्याशी को चुन सके। मतदाता प्रलोभन से बचें और अपनी जिम्मेदारी समझे।


कंप्यूटर और हमारी आंखें

कंप्यूटर और हमारी  आंखें

शहरी जीवनशैली में कंप्यूटर पर लगातार काम करने की बाध्यता और जरूरी सावधानियां नहीं बरते जाने के कारण आजकल युवाओं में भी आंखों की समस्याएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं। हमारे लिए रोशनी का क्या महत्व है, यह हम सभी जानते हैं। इस रोशनी का अर्थ हमें समझ में आता है हमारी आंखों से। यानी आंखें न हों तो इस खूबसूरत दुनिया को हम देख नहीं सकते, प्रकृति के खूबसूरत नजारों का आनन्द नहीं उठा सकते। फिर भी हम अपनी जीवनशैली में लापरवाही के कारण अपनी आंखों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कंप्यूटर, आई पैड और आई फोन के अलावा ऐसे तमाम गैजेट्स हैं, जिनका लगातार इस्तेमाल हमारी आंखों को नुकसान पहुंचा रहा है। आज जिस तेज गति से युवाओं की आंखों की समस्याएं बढ़ रही हैं, उससे यह जानना बेहद जरूरी हो गया है कि आखिर कौन से कारण हैं, जो आंखों को बीमार बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

कंप्यूटर विजन सिंड्रोम

तेजी से बढ़ रही है यह तकलीफ और सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं बच्चे व युवा। कम रोशनी में पढ़ना और देर तक बिना ब्रेक के कंप्यूटर और लैपटॉप पर समय बिताने की आदतें इस समस्या के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां कंप्यूटर पर निर्भरता न हो। स्टूडेंट से लेकर इंजीनियर, सीए और क्लर्क तक का काम कंप्यूटर के बिना संभव नहीं रह गया है।

बचाव के लिए क्या करें

  • ·                   कंप्यूटर से जुड़े रहने वालों को हर 20 मिनट में 20 सेकेंड के लिए 20 फिट दूर की चीज पर फोकस कर व्यायाम करना चाहिए।
  • ·                   कंप्यूटर पर काम करने वाले पलकें झपकाना भूल जाते हैं, इसलिए उन्हें बीच-बीच में पलकें झपका कर आंखों को विश्राम देना चाहिए। 
  • ·                   सोने से पहले ठंडे पानी से आंखें धोएं।
  • ·                   कंप्यूटर डिवाइस का कंट्रास्ट व ब्राइटनेस लेवल सेट करें, जिससे आंखों पर तनाव न पड़े। मल्टीलेयर कवर और कंप्यूटर ग्लास भी फिट करवा सकते हैं।

परिवार का स्वरूप

परिवार का स्वरूप

मानव सम्बंधों पर कार्य कर रहे वैज्ञानिकों को कोई ऐसा समाज नहीं मिला जहाँ विवाह के संबंध परिवार में ही होते हों, इस कारण से परिवार चाहे पितृसत्तात्मक हों या मातृसत्तात्मक, परिवार में पत्नी या पति को अतिरिक्त सदस्यता प्रदान की ही जाती है। युगल परिवार या एकाकी परिवार में पति और पत्नी मिलकर अपनी पृथक घर - गृहस्थी स्थापित करते हैं, परंतु अधिकांशत: समाजों में परिवार 'बृहत्तर कौटुंबिक समूह' का अंग ही माना जाता है और जीवन के विभिन्न प्रसंगों में परिवार के सदस्यों पर घनिष्ट संबध के अतिरिक्त 'बृहत्तर कौटुबिक समूह' का भी नियंत्रण होता है।अमेरिका जैसे उद्योग प्रधान देशों में कुटुंबियों के सम्मिलित एवं बड़े परिवार के स्थान पर युगल परिवार या एकल की बहुलता हो गई है। अमेरिका का समाज पितृसत्तात्मक है, किंतु वहाँ का युगल परिवार किसी एक 'बृहत्तर कुटुंब' का अंग नहीं माना जाता। एकल या युगल परिवार में पति पत्नी और उनके अविवाहित शिशु सम्मिलित माने जाते हैं। 

सम्मिलित परिवारों में इनके अतिरिक्त विवाहित बच्चे और उनकी संतान, विवाहित भाई अथवा बहन और उनके बच्चे एक साथ रह सकते हैं। सम्मिलित परिवार में रक्त संबंधियों की मान्यता भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न है।भारत में एक सम्मिलित परिवार में साधारणत: 10 से लेकर 12 तक सदस्य होते हैं, किंतु कुछ परिवारों में सदस्यों की संख्या 50 - 60 या 100 तक भी होती है। 'समाज के कई बड़े संयुक्त परिवारों से मिलने पर एक बात सामने आई कि इन परिवारों में व्यक्ति से ज़्यादा अहमियत परिवार की होती है। वहां व्यक्तिगत पहचान कोई मुद्दा नहीं होता। परिवार में कुछ बंदिशें होती हैं, जिनका परिवार के सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से पालन करना पड़ता है। 

समाजशास्त्री मानते हैं कि बडे़ संयुक्त परिवारों को सही ढंग से चलाने के लिए लोगों को खुद से ज़्यादा परिवार को महत्त्वपूर्ण मानना पड़ता है।'

समाज में रीति-‍नीतियों का निर्धारण

समाज में रीति-नीतियों का निर्धारण:

समाज में स्‍वच्‍छ एवं स्‍वस्‍थ रीति-नीतियों का होना अत्‍यंत आवश्‍यक है इसके अभाव में समाज को कुरीतियों का भयंकर सामना करना पड़ता है, समाज विपरीत दिशा की ओर जाता हुआ नजर आने लगता है अत: समाज द्वारा स्‍वच्‍छ एवं स्‍वस्‍थ रीति-नीतियों का प्रसार होना चाहिए, तभी विपरीततओं पर अंकुश लगेगा समाज में षोढ़श संस्‍कारों हेतु ऐसी स्‍वच्‍छ एवं स्‍वस्‍थ रीति-नीतियां होनी चाहिए, जिससे समस्‍त वर्ग लाभ उछा सके एक ऐसी सशक्‍त रेखा निर्धारित हो जिसका सभी निर्वाह कर सके, ऐसी ठोस रीति-नीतियों की परम् आवश्‍यकता है यदि समाज में रीति-नीति पुस्तिका का प्रकाशन हो तो वर्तमान भावी पीढ़ी के लिए बड़ी ही सुगमता होगी

समाज में कुरीतियों का निवारण:

समाज में बढती कुरीतियों का प्रचलन एक अत्‍यंत चिंताजनक विषय है वे कुरीतियां जो हमारी प्रगतिशीलता में बाधक है, उन्‍हें हमें समूल हटाने की परम आवश्‍यकता है ऐसी जकड़ी हुई प्राचीन परम्‍पराओं में नई सोच से सुधार और बदलाव लाने की आवश्‍यकता बढ़ गई है समाज की कुरीतियों को एक-जुट होकर संघर्ष से ही हम दूर कर पायेंगे आज की नयी पीढ़ी में बढ़ता नशीला जहर चिंतनीय है, जो पल-पल हमारे शरीर को खोखला कर अनेक बीमारीयों को जन्‍म देता है ऐसी घातक बीमारीयों से शरीर को बचाने तथा स्‍वस्‍थता कायम करने के लिए समाजिक अभियान चलाने की आवश्‍यकता है हमें विकृत समाज नहीं अपितु एक स्‍वस्‍थ समाज बनाने की परम् आवश्‍यकता है

समाज में मितव्‍ययता/फिजुलखर्चीं पर अंकुश की आवश्‍यकता:


समाज का उच्‍च एवं संपन्‍न वर्ग अपने समस्‍त आयोजनों को बढ़ा-चढ़ा कर सम्‍पन्‍न करता है निश्चित ही इससे समाज का मध्‍यम वर्ग तथा निम्‍न वर्ग प्रभावित हुए बिना नहीं रहता वह भी कर्ज की सूली पर चढ़कर उसका अनुसरण करने लगता है और अपना सर्वस्‍व मिटा देता है हमें ऐसे अनुसरण करने वालों को रोकना होगा तथा सर्वस्‍व विनाश से उनको बचाना होगा ऐसा मार्ग प्रशस्‍त करने की आवश्‍यकता है कि शान भी बनी रहे और विनाश से बचा जा सके ऐसे लोगों को नयी प्रेरणा देनी होगी कि फिजूलखर्ची के अनुसरणों से हम अपना बचाव कैसे कर सकते हैं समाज में समय रहते ही इस मितव्‍ययता पर अंकुश लगाने की आवश्‍यकता है
 

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